शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013


चेहरे की किताबों का ये इश्क याद रहे, आबाद रहे



खबर है सबको
हाज़िर नहीं एक साथ हम दोनों
फिर भी कुछ है जो दोनों में चल रहा है (ऐसा कमेंट्स बताते हैं)
वो मेरा तुम्हारी खूबसूरती के बारे में बीस बोलना
वो तुम्हारा उसको कभी स्पैम कर
कभी मैसेज कर कहना "इसे हटा लीजिये, प्लीज़"
एक दिल जीते बादशाह को किसी कनीज़ कर कहना लगता है। 
वो कभी कुछ भी लिख कर मेरे लेटेस्ट कमेन्ट को तह कर के छुपा देना 

हाज़िर नहीं एक साथ हम दोनों
फिर भी, कोई एक्टिविटी कहीं देखता तो लगता था 
तुमने ये "हरकत" साथ रह कर की है।

अब भी जाता हूँ तुम्हारे वाल पर मैं
कोई स्टेटस अपडेट किये महीनों हुए 
मगर लगता है एक सदी यहाँ रुकी पड़ी है।
यूँ तो मेरे ज़ेहन में तुम सबस्क्राइब हो 
मगर अपनी वाल पर भी कुछ कह दिया करो तो 
मेरे अन्दर का रुका वक्त भी चल पड़े 
इस उम्र की आवारगी की प्यास बुझे
ताकि चेहरे की किताबों का ये इश्क याद रहे, आबाद रहे.


(हाँ बाबा ! गुलज़ार के इश्कटाइल में )

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर।


गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे कांटों के बीच खिला इतना लाल कि जैसे काला गुलाब, दिल जिसे शिवलिंग मान गाढ़ा, लाल टप टप करता अभिषेक करता है। जैसे बनैले जंगल में अमरलता। जैसे बेबसी में कैद जिंदगी, जैसे ढ़ीले वसन में अस्त व्यस्त औरत। जैसे शैतान जादूगर के डिब्बे में खूबसूरत राजकुमारी।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे बदहवासी में मुंह से गिरता लार। सुनहला, गाढ़ा। रंग और स्वाद एक से। पर बोतल की बीयर ठंडी और मुंह का लार गर्म। तुम्हारे लिए अन-हाईजेनिक लेकिन मेरे लिए असली तुम।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। फेन में कैद। जैसे रात की राख। अपने वक्त का मास्टर फिर सिफर। अपनी उम्र के उरूज में सब कुछ और फिर जिंदगी का एक हिस्सा भर।

तुम्हारे लिए मैं अंधा होकर तिलचट्टे सा रडार लगाए घूम रहा हूं। कोई जंगली चूहा किसी घर के रसाई में घुस आया है। कोई सूअर गुज़रे वक्त के सारे गजालत भरे पलों को अपने नथुनों से घिनौना मान दरकिनार कर रहा है। मन का कीड़ा चलते चलते ऊब कर उलट जाता है, पीठ के बल चलता है थोड़ी दूर, उभयचर भी कहलाता है।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर। बोतल, फेन, दिमाग की नसों में कैद। पपीते में काले बीज सा। कच्चे आमों में मौजूद खिच्चे बिया सा। शाम ढ़ले ताखे पर रखा डिबिया सा।

पता था आदम को कि बीयर था करता इंतज़ार उसका। होठों का असली चंुबन। होठों का असली काम - चुनाव। होठों का असली काम - अपनाना।

गाढ़ी, ठंडी बहुत ठंडी बीयर।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013


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यहाँ की पृष्ठभूमि है इमारतें-
घरों के पीछे घर
घरों के ऊपर घर

ये शहर शहर नहीं
है अब आँगन
इन्हीं इमारतों के बीच घिरा

कभी कभी चाँद भी दिख जाता होगा
लोगों को फुर्सत में,
जब एक उजाले के स्त्रोत
को ले कर वो हो जाते होंगे विस्मित
और ताकते होंगे ठीक ऊपर।

मुँह और चाँद आमने-सामने
आज कितने दिनों बाद
इस शहर में

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

aksar yu hi


रातो को  तन्हाई में, अक्सर सोचा करते हैं
क्या खास है पाया तुम में, तुम पर क्यों हम मरते हैं?
सवाल ये हमने किया खुद से जब, एक बार न सों बार किया
जवाब कभी न आया जुदा  सा, हर बार एक इज़हार किया
तुम को पाकर हम हुए धनवान, तुमको खो कर हुए गरीब
कोशिश बहुत की हमने, पर बदल  न पाए अपने नसीब
फिर भी दिल में एक आस है, तेरे पास होने का एहसास है
दूर तू नजरो से हो मगर, दिल के हर दम पास है
आजा अब लौट के आजा, तेरे बिना मन उदास है
जल्दी  आजा, दौड़  के आजा, ना जाने कब तक इन साँसों में सांस है
साभार  - (लेखिका : अनुष्का सूरी )

dil ki baat aabhar k sath


Khusbo’n Ki Tarha Meri Har Saans Mein
Pyar Apna Basane Ka Waada Karo
Rang Jitne Tumhari Mohabbat Ke Hai
Mere Dil Mein Sajane Ka Waada Karo
Hai Tumhari Wafaon Pe Mujhko Yaqeen
Phir Bhi Dil Chata Hai Mere Dil Nasheen
Yunhi Meri Tasalli Ki Khatir Zara
Mujhko Apna Banane Ka Waada Karo
Jab Mohabbat Ka Iqrar Karte Ho Tum
Dharkano Mein Naya Rang Bharte Ho Tum
Barha Kar Chuke Ho Magar Aaj Phir
Mujhko Apna Banane Ka Waada Karo
Sirf Lafzon Se Iqraar Hota Nahin
Ik Janib Se Hi Pyar Hota Hai
Mai Tumhe Yaad Rakhne Ki Khaun Kasam
Tum Mujhko Na Bhulne Ka Waada Karo…
क्या ख्याल  है . 


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

aaj tisari baat ko shuru kar raha hu


Ajmer Me Ek Din

आज  अजमेर में एक दिन बीत गया। 

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