ज्यों उठा में ऊपर
अंदर पैठता ही गया
पत्थरों को सहलाने में
मैं पिघलता ही गया
जितना उड़ा उतना बँधा
जितना डूबा उतना उबरा
कूछ कह जाने की कोशिश में
मौन होता ही गया
काश मुठ्ठी में बँध जाता
ये सपना मेरा
बिना बाँधे सपना
सच में साकार होता ही गया